Wednesday, 15 June 2016

क्या आप इंजीनियरिंग करने जा रहे हैं. तो क्या आप ये जानते हैं. (How to choose an engineering college)

आजकल जैसे मार्किट में एडमिशन का सैलाब आ गया हैं।  जहां देखो  वहा  आपको एडमिशन के पोस्टर ही पोस्टर मिल जायेंगे कोई कॉलेज आपको मुफ्त में एडमिशन दे रहा हैं तो कोई लुभावने बैनर्स के तले एडमिशन लेना चाह रहा हैं. एक तरफ दुनियाभर के कॉलेज खुल गए हैं और दूसरी ओर कॉलेजेस को  एडमिशन्स नहीं मिलते, अजीब विटंबना हैं. एक वो दौर था जब कॉलेज  कम होते थे और स्टूडेंट ज्यादा अब स्टूडेंट से ज्यादा कॉलेज। देखने वाली बात होती हैं की इस बिच स्टूडेंट्स में क्या चर्चा हो रही हैं.


कल जब मैं  जॉगिंग कर रहा था और मैंने कुछ बच्चों को बात करते सुना "अरे यार मैं तो पुणे के फोर्ट(नाम बदला गया हैं.) इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लूंगा." दूसरे दोस्त के पूछे जाने पर की क्यों इतनी दूर जब की यहाँ अपनी सिटी में भी कॉलेज हैं. तो दूसरे बच्चे ने कहा अरे वो अपने राज्य का सबसे अच्छा कॉलेज हैं और कंपनी वहाँ के स्टूडेंट को तुरंत उठाती हैं.





मैं सोच में पढ़ गया की मैंने भी कई इंटरव्यू दिए हैं और मुझे कभी किसीने नहीं पूछा की आप किस यूनिवर्सिटी से हो या किस कॉलेज से हो. बस पूछा तो मेरे परसेंटेज और मेरा पसंदीदा सब्जेक्ट और उसका ज्ञान। मेरे ख्याल से आपको कोई कंपनी यूनिवर्सिटी शायद ही पूछती हैं फिर चाहे वो स्टूडेंट नागपुर का हो. बिहार का हो या फिर दिल्ली मुंबई या पुणे का. अगर आपमें प्रतिभा हैं तो आप कही भी जा सकते हो.




कॉलेज और अपनी ब्रांच चूस करते समय ये जरुरु देखे की वहाँ लेक्चर ठीकसे होते हैं या नहीं उस कॉलेज में भेदभाव तो नहीं होता , उस कॉलेज के स्टाफ खुश हैं या नहीं और सबसे महत्वपूर्ण बात उस कॉलेज का डिसिप्लिन कैसा हैं. आर्गेनाइजेशन में डिसिप्लिन की कमी हो तो वो ज्यादा दिन नहीं टिकता और अपने  स्टूडेंट्स को कुछ दे भी नहीं पता.





कॉलेज अक्रिडेटेड हैं या नहीं ये भी जरुरु देखे। अगर आप कॉलेज में कितने कैंपस सिलेक्शन होते हैं यह सोचकर कॉलेज का विकल्प चुनते हैं तो ये गलत हैं। मुझे बताईये किसी एक ब्रांच से २० स्टूडेंट किसी दिग्गज कंपनी में सिलेक्ट होते हैं तो क्या बाकीके ४० बच्चे जॉब से वंचित रह गए।  ऐसा  होता तो शायद कम्पनिया बंद पड़ जाती। आजभी कंपनी को अपने ८० % स्टाफ ऑफ कैंपस से मिलते हैं.




आपका लिया हुआ एक सही फैसला आपके अगले ४० साल बनाने वाला हैं और हा दूर के ढोल सुहावने लगते हैं बेटर हैं की अपने घर से नजदीक के किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले  ताकि आप आर्थिक ,सामाजिक और मानसिक तरीके खुश रहे. एक खुश रहने वाला स्टूडेंट ज्यादा बेहतर परफॉर्म कर सकता हैं। मगर एक बात और कहना चाहता हु की अगर आपको सचमे एक बेहतर कॉलेज मिलता हैं तो जाइए और ज्वाइन कीजिये मगर हा अपना मक़सद मत भूलिए की आप घर से दूर क्या करने आये हैं.

अक्सर मैं स्टूडेंट को पूछते हुए देखता हु की फलाना ब्रांच का स्कोप क्या होगा। या जो ब्रांच बूम में  हैं ,या फ़िलहाल जिस ब्रांच से सबसे ज्यादा लोग जॉब पा  रहे हैं क्या मई वो ले लु ?. इंजीनियरिंग एक सैनोसिडल वेव की तरह हैं।  इसलिए जो ब्रांच आज उच्च शिखर पर हैं, वो शायद अगले ४ साल में वजूद खो दे और उसके जॉब कम हो जाये।  इसलिए भेड़ की तरह न करे पहले सोचे की कितने % लोग अभी जॉब पा चुके हैं और कितने दिनों तक वेकन्सी रहने वाली हैं. और सबसे अच्छी और महत्वपूर्ण बात।  आपको जिसमे मज़ा आये वो ब्रांच ले।  नकि दोस्त ने बोला और मैंने ले लिया. 




ये वो फ़ोर्स होगा जो आपको आपके चार साल की पढाई में आपको अपने मकसद को पूरा करने में मदद करेगा।




मैं जनता हु की इस एक लेख में मैं आपको वो सभी बाते नहीं बता सकता जो एक अच्छा कॉलेज चूस करने में आपकी मदद करे , क्यों न इसे हम सब मिलके चर्चा का विषय बनाए। आप अपने सुझाव कमेंट में डाले और बताये।


Saturday, 4 June 2016

क्या मैं भी ये कर सकता हु. बेहतर भविष्य के लिए. (Environment day myths and reality)

पिछले कुछ दिनों से मैंने देखा हैं की मेरे मित्र पर्यावरण की काफी चिंता करने लगे हैं शायद करनी भी चाहिए पर मैं इस तरह की चिंता को सिंथेटिक चिंता ही कहूंगा क्युकी जैसे ही पर्यावरण दिन जायेगा वैसे ही सारी चिंताएं भी ढेर हो जाएगी। ये कुछ  इस तरह हैं की १५ अगस्त के कुछ दिन पहले हमारी देशभक्ति जागृत हो जाती हैं और फिर साल भर हम सोचते भी नहीं.

कुछ पर्यावरण प्रेमी ऐसे भी मिल जायेंगे जो अपने जन्मदिन पर पेड़ लगाते हैं. हा मगर हर साल उसी गड्ढे में. क्युकी हम पेड़ सिर्फ इसलिए लगते हैं ताकि हमारी एक अच्छी सेल्फी आसके। हम ये कभी नहीं सोचते की मैं इस पेड़ को बड़ा करूँगा मैं उसे अपनी आने वाली पीढ़ी को दे सकु। "ये तो बड़ी बड़ी बाते लगती हैं " तो ठीक हैं छोटे छोटे काम करो। आप अपने ऑफिस से शुरुआत कर सकते हैं.

हम कितनी बार सोचते हैं की प्रिंटिंग के पहले लिखा हुआ ब्यौरा जाँच ले. हम पहले प्रिंट निकालते हैं और फिर जांचते हैं. "अरे मेरे एक प्रिंट से कोनसा आसमान टूट पड़ेगा " जी हा आपके एक प्रिंट से कुछ न होगा पर आपके जैसे काफी महानुभाव अगर ऐसे सोचे तो जरुरु टूट पड़ेगा.

ऑफिस की दूसरी वस्तु हैं पेन(कलम) जो अक्सर हम चाइना की इस्तेमाल करते हैं क्युकी सस्ती हैं और यूज़ एंड थ्रो हैं. अगर महीने में हम ४ पेन इस्तेमाल करे और ऐसे ही ऑफिस के १० लोग करे तोह ४*१० = ४० * १२= ४८० ये हिसाब एक ऑफिस का हैं. तो सोचिये हम भारत में कितना प्लास्टिक रोज फेंकते हैं।

तीसरी वस्तु हैं लाइट। एक छोटेसे कमरे में हम बैठते हैं लाइट लगते हैं , मगर नेचुरल लाइटिंग इस्तेमाल नहीं करते। खिड़किया बंद करके लाइट चालू रखके कोनसी होशियारी करते हैं हम.


ऑफिस वो जगह हैं जहां AC होता हैं. तो करलो इस्तेमाल "अपना क्या जाता हैं " खिड़किया नहीं खोलेंगे। जरा सोचिये मशीन की हवा और नेचुरल हवा। फर्क हैं भाई

चाय पीते है डिस्पोजल में और उसे फेक देते हैं सोचिये अगर हम अपना कप इस्तेमाल करे तो शायद साल भरमे हम ७३० प्लास्टिक के कप बचा ले.

आये दिन हम नए नए मोबाइल लेते रहते हैं मगर पुराने वाले को अपने पास याद की तोर पर रखते हैं। किसी को देते क्यों नहीं। आपके किसी को देने से एक मोबाइल कम खरीदेगा और पर्यावरण को उतना ही फायदा होगा।

लिखने को बहुत हैं पर समय की कमी के कारन बस इतना ही। आपको कुछ और भी पता हो तो कमेंट में लिखे की किस तरह से छोटी चीजों से हम बड़े काम कर सकते हैं जी हा समय आ गया हैं पर्यावरण के बारे में सोचने का। क्यों इस गर्मी में आप समझ ही गए होंगे की पृथ्वी के क्या हाल हैं और ऐसे ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हम तरस जाएंगे की कोई ऐसी जगह हो जहां हम साफ साँसे ले सके। कुछ कंपनी तो बोतल बंद हवा भी बेचने के फिरत में हैं। यकीं नहीं तो गूगल करके देख ले। सेल्फी के लिए नहीं अपने लिए पेड़ लगाए और हा सिर्फ पेड़ न लाये उसे जिलाए।